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थी चाल हश्र में भी क़यामत हुज़ूर की | शाही शायरी
thi chaal hashr mein bhi qayamat huzur ki

ग़ज़ल

थी चाल हश्र में भी क़यामत हुज़ूर की

जावेद लख़नवी

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थी चाल हश्र में भी क़यामत हुज़ूर की
सच पूछिए तो झेंप गई आँख हूर की

सच है कि राज़-ए-वस्ल छुपाना नहीं है सहल
मैं क्या कहूँ जो कहती है चितवन हुज़ूर की

जाने से दिल के क्यूँ न हो वीरान बज़्म-ए-ऐश
शब भर इसी से रहती थी बातें हुज़ूर की

ग़श आज आ गया है ख़ुदा जाने कल हो क्या
मूसा अब और सैर करो कोह-ए-तूर की

जन्नत में पूछते हुए 'जावेद' हम चले
दूकान किस तरफ़ है शराब-ए-तहूर की