थी चाल हश्र में भी क़यामत हुज़ूर की
सच पूछिए तो झेंप गई आँख हूर की
सच है कि राज़-ए-वस्ल छुपाना नहीं है सहल
मैं क्या कहूँ जो कहती है चितवन हुज़ूर की
जाने से दिल के क्यूँ न हो वीरान बज़्म-ए-ऐश
शब भर इसी से रहती थी बातें हुज़ूर की
ग़श आज आ गया है ख़ुदा जाने कल हो क्या
मूसा अब और सैर करो कोह-ए-तूर की
जन्नत में पूछते हुए 'जावेद' हम चले
दूकान किस तरफ़ है शराब-ए-तहूर की
ग़ज़ल
थी चाल हश्र में भी क़यामत हुज़ूर की
जावेद लख़नवी

