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ठहरा है क़रीब-ए-जान आ कर | शाही शायरी
Thahra hai qarib-e-jaan aa kar

ग़ज़ल

ठहरा है क़रीब-ए-जान आ कर

शाहिदा हसन

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ठहरा है क़रीब-ए-जान आ कर
जाने का नहीं ये ध्यान आ कर

आईना लिया तो तेरी सूरत
हँसने लगी दरमियान आ कर

टपके न ये अश्क चश्म-ए-ग़म से
जाए न ये मेहमान आ कर

पलटी जो हवा गए दिनों की
दोहरा गई दास्तान आ कर

क़दमों से लिपट गए हैं रस्ते
आता ही नहीं मकान आ कर

जा पहुँची ज़मीन उस से मिलने
मिलता न था आसमान आ कर