EN اردو
था मगर इतना ज़ियादा तो जुनूँ-ख़ेज़ न था | शाही शायरी
tha magar itna ziyaada to junun-KHez na tha

ग़ज़ल

था मगर इतना ज़ियादा तो जुनूँ-ख़ेज़ न था

सय्यद काशिफ़ रज़ा

;

था मगर इतना ज़ियादा तो जुनूँ-ख़ेज़ न था
पहले देखा था तो लब ही था ये लबरेज़ न था

थीं मगर इतनी भी बदमस्त न थीं ये आँखें
था मगर आँख में सुर्मा तिरा यूँ तेज़ न था

तेरे फूलों से ये ख़ुशबू तो नहीं आती थी
मौसम-ए-लम्स से तू क़र्या-ए-ज़रख़ेज़ न था

याद तो है तिरी कम-उम्र निगाहों का फ़ुसूँ
लेकिन उस चश्म-ए-जवाँ सा सेहर-अंगेज़ न था

टूटी पड़ती न थीं आँखें मिरी तुझ पर ऐसे
गुल-ब-दामाँ तो तू पहले ही था गुल-ए-रेज़ न था

जैसा मव्वाज था उस हुस्न का दरिया 'काशिफ़'
दिल का तूफ़ान कोई वैसा बला-ख़ेज़ न था