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तेरी ज़बाँ से ख़स्ता कोई ज़ार है कोई | शाही शायरी
teri zaban se KHasta koi zar hai koi

ग़ज़ल

तेरी ज़बाँ से ख़स्ता कोई ज़ार है कोई

क़ाएम चाँदपुरी

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तेरी ज़बाँ से ख़स्ता कोई ज़ार है कोई
प्यारे ये नहव ओ सर्फ़ ये गुफ़्तार है कोई

ठोकर में हर क़दम की तड़पते हैं दिल कई
ज़ालिम इधर तो देख ये रफ़्तार है कोई

जूँ शाख़-ए-गुल है फ़िक्र में मेरी शिकस्त की
मेरा गर उस चमन में हवा-दार है कोई

ज़ालिम ख़बर तो ले कहीं 'क़ाएम' ही ये न हो
नालान ओ मुज़्तरिब पस-ए-दीवार है कोई