तेरी याद और तेरे ध्यान में गुज़री है
सारी ज़िंदगी एक मकान में गुज़री है
इस तारीक फ़ज़ा में मेरी सारी उम्र
दिया जलाने के इम्कान में गुज़री है
अपने लिए जो शाम बचा कर रक्खी थी
वो तुझ से अहद-ओ-पैमान में गुज़री है
तुझ से उक्ता जाने की इक साअत भी
तेरे इश्क़ ही के दौरान में गुज़री है
दीवारों का शौक़ जहाँ था सब को 'जमाल'
उम्र मिरी उस ख़ानदान में गुज़री है
ग़ज़ल
तेरी याद और तेरे ध्यान में गुज़री है
जमाल एहसानी

