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तेरी मर्ज़ी के ख़द-ओ-ख़ाल में ढलता हुआ मैं | शाही शायरी
teri marzi ke KHad-o-Khaal mein Dhalta hua main

ग़ज़ल

तेरी मर्ज़ी के ख़द-ओ-ख़ाल में ढलता हुआ मैं

शाहिद ज़की

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तेरी मर्ज़ी के ख़द-ओ-ख़ाल में ढलता हुआ मैं
ख़ाक से आब न हो जाऊँ पिघलता हुआ मैं

ऐ ख़िज़ाँ मैं तुझे ख़ुश-रंग बना सकता था
तुझ से देखा न गया फूलता-फलता हुआ मैं

मुझ को माँगी हुई इज़्ज़त नहीं पूरी आती
टूट जाऊँ न ये पोशाक बदलता हुआ मैं

शोबदा-गर नहीं मेहमान-ए-सफ़-ए-याराँ हूँ
ज़हर पीता हुआ और शहद उगलता हुआ मैं

यम-ब-यम रूह मचलती हुई मछली की तरह
दम-ब-दम वक़्त के हाथों से फिसलता हुआ मैं

अब मिरी राख उड़ा या मुझे आँखों से लगा
तुझ तलक आ गया हूँ आग पे चलता हुआ मैं

कह रही हैं मुझे वो हौसला-अफ़्ज़ा आँखें
रूह तक जाऊँ ख़द-ओ-ख़ाल मसलता हुआ मैं

हो न हो एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं
रक़्स करता हुआ तू आग में जलता हुआ मैं

कार-ए-दरवेशी जज़ा-याब है लेकिन 'शाहिद'
ख़ुश नहीं ख़ल्वत-ए-ख़ाली से बहलता हुआ मैं