EN اردو
तेरे आलम का यार क्या कहना | शाही शायरी
tere aalam ka yar kya kahna

ग़ज़ल

तेरे आलम का यार क्या कहना

आग़ा हज्जू शरफ़

;

तेरे आलम का यार क्या कहना
हर तरफ़ है पुकार क्या कहना

उफ़ न की दर्द-ए-हिज्र ज़ब्त किया
ऐ दिल-ए-बे-क़रार क्या कहना

वादा-ए-वस्ल उन से लूँ क्यूँ-कर
मेरा क्या इख़्तियार क्या कहना

क्या ही नैरंगियाँ दिखाई हैं
मेरे बाग़-ओ-बहार क्या कहना

कैसे आशिक़ हैं उन से जब पूछा
बोले बे-इख़्तियार क्या कहना

मुश्त पर भी गुलों के गर्द रहे
आफ़रीं ऐ हज़ार क्या कहना

तिरछी नज़रें छुरी कटारी हैं
चश्म-ए-बद-दूर यार क्या कहना

गुलशनों में ये रंग-रूप कहा
ला-जवाब ऐ निगार क्या कहना

दम-ए-ईसा को मात करती है
ऐ नसीम-ए-बहार क्या कहना

इम्तिहाँ कर चुके तो वो बोले
ऐ मिरे जाँ-निसार क्या कहना

उस के कूचे में बैठ कर न उठा
वाह मेरे ग़ुबार क्या कहना

जानते हैं कि जान दोगे 'शरफ़'
उस को फिर बार बार क्या कहना