तेरा ख़याल तेरी तमन्ना तक आ गया
मैं दिल को ढूँढता हुआ दुनिया तक आ गया
क्या इतना बढ़ गया मिरी तिश्ना-लबी का शोर
सैलाब देखने मुझे सहरा तक आ गया
लेकिन ख़िज़ाँ की नज़्र किया आख़िरी गुलाब
हर-चंद इस में मुझ को पसीना तक आ गया
आगे रह-ए-फ़िराक़ में आना है और क्या
आँखों के आगे आज अंधेरा तक आ गया
क्या इर्तिक़ा-पज़ीर है इंसान का ज़मीर
रिश्तों को छोड़-छाड़ के अश्या तक आ गया
लेकिन किसी दरीचे से झाँका न कोई रात
सुन कर मिरी पुकार सितारा तक आ गया
'काशिफ़'-हुसैन यार उठो अब तो चल पड़ो
चल कर तुम्हारे पाँव में रस्ता तक आ गया
ग़ज़ल
तेरा ख़याल तेरी तमन्ना तक आ गया
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर

