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तेग़-ए-बर्रान निकालो साहब | शाही शायरी
tegh-e-barran nikalo sahab

ग़ज़ल

तेग़-ए-बर्रान निकालो साहब

जुरअत क़लंदर बख़्श

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तेग़-ए-बर्रान निकालो साहब
दिल के अरमान निकालो साहब

घर से रखते हो क़दम क्यूँ बाहर
न मिरी जान निकालो साहब

देख रहने से ख़फ़ा हो तो मिरी
चश्म-ए-हैरान निकालो साहब

है ये नासूर-ए-जिगर की बत्ती
तुम न पैकान निकालो साहब

रहने दो घर में न मुझ पर नाहक़
रख के बोहतान निकालो साहब

बार अग़्यार को ख़ल्वत में न दो
हैं बद इंसान, निकालो साहब

है मिरी तरह तुम्हारा कहीं ध्यान
दिल से ये ध्यान निकालो साहब

गाली नाहक़ न किसी के हक़ में
मुँह से हर आन निकालो साहब

हाए ये रंजिश-ए-बेजा दिल से
किसी उन्वान निकालो साहब

सर-ए-बाज़ार न बैठा करो तुम
कुछ तो अब शान निकालो साहब

गर्म-बाज़ारी की ख़ातिर सर-ए-राह
तुम न दूकान निकालो साहब

हसरत-ए-वस्ल है 'जुरअत' को कमाल
लो ये अरमान निकालो साहब