तेग़-ए-बर्रान निकालो साहब
दिल के अरमान निकालो साहब
घर से रखते हो क़दम क्यूँ बाहर
न मिरी जान निकालो साहब
देख रहने से ख़फ़ा हो तो मिरी
चश्म-ए-हैरान निकालो साहब
है ये नासूर-ए-जिगर की बत्ती
तुम न पैकान निकालो साहब
रहने दो घर में न मुझ पर नाहक़
रख के बोहतान निकालो साहब
बार अग़्यार को ख़ल्वत में न दो
हैं बद इंसान, निकालो साहब
है मिरी तरह तुम्हारा कहीं ध्यान
दिल से ये ध्यान निकालो साहब
गाली नाहक़ न किसी के हक़ में
मुँह से हर आन निकालो साहब
हाए ये रंजिश-ए-बेजा दिल से
किसी उन्वान निकालो साहब
सर-ए-बाज़ार न बैठा करो तुम
कुछ तो अब शान निकालो साहब
गर्म-बाज़ारी की ख़ातिर सर-ए-राह
तुम न दूकान निकालो साहब
हसरत-ए-वस्ल है 'जुरअत' को कमाल
लो ये अरमान निकालो साहब
ग़ज़ल
तेग़-ए-बर्रान निकालो साहब
जुरअत क़लंदर बख़्श

