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तौबा का पास रिंद-ए-मय-आशाम हो चुका | शाही शायरी
tauba ka pas rind-e-mai-asham ho chuka

ग़ज़ल

तौबा का पास रिंद-ए-मय-आशाम हो चुका

रिन्द लखनवी

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तौबा का पास रिंद-ए-मय-आशाम हो चुका
बस हो चुका तक़द्दुस-ए-इस्लाम हो चुका

शम-ए-हरम था गाह गहे दैर का चराग़
मैं ज़ेब-ए-कुफ़्र-ओ-रौनक़-ए-इस्लाम हो चुका

कोठे पे चलिए लुत्फ़-ए-शब-ए-माह देखिए
सब चाँदनी का फ़र्श लब-ए-बाम हो चुका

दीं-दार बरहमन कहे काफ़िर बताए शैख़
दोनों तरफ़ से मोरिद-ए-इल्ज़ाम हो चुका

अक्सर मुशाएरे पे हुआ बज़्म-ए-ग़म का शक
क्या क्या मिरे कलाम पे कोहराम हो चुका

क़ुरआँ उठाते हैं तम-ए'-ज़र के वास्ते
दीं-दार अगर यही हैं तो इस्लाम हो चुका

का'बे को जाते जाते फिरे सू-ए-दैर 'रिंद'
लो हज कर आए आप और एहराम हो चुका