तसव्वुर से नज़ारे तक फ़रोग़-ए-सेहर-ए-हैरत है
हक़ीक़त भी फ़साना है फ़साना भी हक़ीक़त है
किसी पर जान देना बे-नियाज़-ए-मुदआ हो कर
यही जज़्बा मिरे नज़दीक मेराज-ए-मोहब्बत है
ज़बाँ पर आ के जो हर्फ़-ओ-हिकायत से गुज़र जाए
न जाने क्यूँ वही बात उन से कहने की ज़रूरत है
सवाल उठता नहीं कोई यहाँ हद्द-ए-तअ'य्युन का
वहाँ तक जुस्तुजू भी है जहाँ तक हुस्न-ए-फ़ितरत है
जिसे आता नहीं परवाना-ए-शम-ए-वतन होना
वो नंग-ए-आदमियत है अदू-ए-क़ौम-ओ-मिल्लत है
हम अपनी ज़िंदगी की हर ख़ुशी को क्यूँ न ग़म समझें
जो तेरे ग़म का हासिल है उसी का नाम राहत है
मज़ाक़-ए-ज़िंदगी को है शुऊर-ए-ज़िंदगी लाज़िम
वहाँ जीने में राहत है जहाँ मरना सआ'दत है
हमारे हाल की क्या पूछते हो क्या बताएँ हम
हमारा हाल जो कुछ है तुम्हारी ही इनायत है
दिल-ए-शाइस्ता-ए-ग़म ने लगा रक्खी है सीने से
हज़ार उन की नज़र ग़ारत-गर-ए-आराम-ओ-राहत है
'रिशी' नाकाम सई-ए-जुस्तुजू है ज़ौक़-ए-नज़्ज़ारा
नज़र आवारा फ़ितरत है जहाँ जल्वों की कसरत है
ग़ज़ल
तसव्वुर से नज़ारे तक फ़रोग़-ए-सेहर-ए-हैरत है
ऋषि पटियालवी

