EN اردو
तरब के मख़मसे ग़म के झमेले | शाही शायरी
tarab ke maKHmase gham ke jhamele

ग़ज़ल

तरब के मख़मसे ग़म के झमेले

अर्श मलसियानी

;

तरब के मख़मसे ग़म के झमेले
दिल-ए-नादाँ ने लाखों खेल खेले

गए इक एक कर के हम-सफ़र सब
हमीं ज़िंदा हैं मरने को अकेले

ग़म-ए-दौराँ से उतनी बार हारे
ग़म-ए-जानाँ से जितनी बार खेले

दिल आख़िर ताब लाता भी तो कब तक
क़यामत थे तमन्नाओं के रेले

ये दुनिया ख़त्म हो जाएगी आख़िर
न होंगे ख़त्म दुनिया के झमेले

न कोई हम-ख़याल ऐ 'अर्श' पाया
रहे हम अंजुमन में भी अकेले