तन्हा शजर के दर्द का एहसास दे गया
इक शख़्स मुझ को जिस्म का बन-बास दे गया
लब-हा-ए-नीलगूँ पे हैं उस की अमानतें
जाते लबों का जौहर-ए-अल्मास दे गया
जिस में कभी भी अक्स की किर्चें नहीं रहीं
टूटा हुआ वो शीशा-ए-एहसास दे गया
अब तक है मेरे हाथों में ख़ुश्बू रची हुई
मस्लूब हो के फूल बहुत बास दे गया
इक रूद-ए-बेवफ़ाई में मुझ को बहा के आज
सातों-समुंदरों की कोई प्यास दे गया
इक ना-मुराद उफ़ुक़ पे है कोहरे का चाँद सा
कैसी 'मुसव्विर' आस वो बे-आस दे गया
ग़ज़ल
तन्हा शजर के दर्द का एहसास दे गया
मुसव्विर सब्ज़वारी

