तन्हा न दिल ही लश्कर-ए-ग़म देख टल गया
इस मारके में पा-ए-तहम्मुल भी चल गया
हैं गर्म-ए-गुफ़्तुगू गुल ओ बुलबुल चमन के बीच
होगा ख़लल सबा जो कोई पात मिल गया
उस शम्अ-रू से क़स्द न मिलने का था हमें
पर देखते ही मोम-सिफ़त दिल पिघल गया
मुनइम तू याँ ख़याल-ए-इमारत में खो न उम्र
ले कौन अपने साथ ये क़स्र-ओ-महल गया
लागी न ग़ैर-ए-यास हिना-ए-उमीद हाथ
दुनिया से जो गया कफ़-ए-अफ़्सोस मल गया
उस राह-रौ ने दम में किया तय रह-ए-अदम
हस्ती के संग से जो शरर सा उछल गया
देखा हर एक ज़र्रे में उस आफ़्ताब को
जिस चश्म से कि बे-बसरी का ख़लल गया
गुज़री शब-ए-शबाब हुआ रोज़-ए-शेब अख़ीर
कुछ भी ख़बर है क़ाफ़िला आगे निकल गया
क़ाबिल मक़ाम के नहीं 'बेदार' ये सराए
मंज़िल है दूर ख़्वाब से उठ दिन तो ढल गया
ग़ज़ल
तन्हा न दिल ही लश्कर-ए-ग़म देख टल गया
मीर मोहम्मदी बेदार

