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तन्हा न दिल ही लश्कर-ए-ग़म देख टल गया | शाही शायरी
tanha na dil hi lashkar-e-gham dekh Tal gaya

ग़ज़ल

तन्हा न दिल ही लश्कर-ए-ग़म देख टल गया

मीर मोहम्मदी बेदार

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तन्हा न दिल ही लश्कर-ए-ग़म देख टल गया
इस मारके में पा-ए-तहम्मुल भी चल गया

हैं गर्म-ए-गुफ़्तुगू गुल ओ बुलबुल चमन के बीच
होगा ख़लल सबा जो कोई पात मिल गया

उस शम्अ-रू से क़स्द न मिलने का था हमें
पर देखते ही मोम-सिफ़त दिल पिघल गया

मुनइम तू याँ ख़याल-ए-इमारत में खो न उम्र
ले कौन अपने साथ ये क़स्र-ओ-महल गया

लागी न ग़ैर-ए-यास हिना-ए-उमीद हाथ
दुनिया से जो गया कफ़-ए-अफ़्सोस मल गया

उस राह-रौ ने दम में किया तय रह-ए-अदम
हस्ती के संग से जो शरर सा उछल गया

देखा हर एक ज़र्रे में उस आफ़्ताब को
जिस चश्म से कि बे-बसरी का ख़लल गया

गुज़री शब-ए-शबाब हुआ रोज़-ए-शेब अख़ीर
कुछ भी ख़बर है क़ाफ़िला आगे निकल गया

क़ाबिल मक़ाम के नहीं 'बेदार' ये सराए
मंज़िल है दूर ख़्वाब से उठ दिन तो ढल गया