तमन्नाओं की दुनिया में क़दम धरने नहीं देती
जो करना चाहता हूँ ज़िंदगी करने नहीं देती
कोई सूरत नहीं है ज़िंदगी से बच निकलने की
ग़म-ओ-आलाम के मारों को भी मरने नहीं देती
अंधेरा लाख हो मुझ को सहर की आस रहती है
यही वो रौशनी है जो मुझे डरने नहीं देती
कोई मौसम हो उन ज़ुल्फ़ों की ख़ुशबू ले ही आती है
हवा-ए-शौक़ दिल के ज़ख़्म को भरने नहीं देती
ख़ुदा ने मेरे अंदर क्या ख़बर क्या चीज़ रख दी है
जो समझौता मुझे हालात से करने नहीं देती
मुझे मालूम है वा'दा निभाना सख़्त मुश्किल है
मिरी कम-हिम्मती इंकार भी करने नहीं देती
गुज़रती रौ बदलती जा रही है एक इक शय को
किसी शय से मुझे उल्फ़त का दम भरने नहीं देती
ग़ज़ल
तमन्नाओं की दुनिया में क़दम धरने नहीं देती
जमील यूसुफ़

