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तमाम शहर की आँखों का माहताब हुआ | शाही शायरी
tamam shahr ki aankhon ka mahtab hua

ग़ज़ल

तमाम शहर की आँखों का माहताब हुआ

अरशद अब्दुल हमीद

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तमाम शहर की आँखों का माहताब हुआ
मैं जब से उस की निगाहों में इंतिख़ाब हुआ

हवा के काँधों ने पहुँचाया आसमानों तक
मैं बर्ग-ए-सब्ज़ था सूखा तो आफ़्ताब हुआ

पलट के देखूँ तो मुझ को सज़ाएँ देता है
अजब सितारा रह-ए-ग़म में हम-रिकाब हुआ

यूँ क़ौस-ए-चश्म में आया वो बारिशों की तरह
कि हर्फ़-ए-दीद कई रंगों की किताब हुआ

पिघल के आ गई सारी उदासी लफ़्ज़ों में
वुफ़ूर-ए-ग़म मिरे आईने में हबाब हुआ

मैं अपनी ख़्वाहिशें गुम कर के मिल गया उस को
ख़ुशा वो मेरी मोहब्बत में कामयाब हुआ