EN اردو
तलाश जिस नूर की है तुझ को छुपा है तेरे बदन के अंदर | शाही शायरी
talash jis nur ki hai tujhko chhupa hai tere badan ke andar

ग़ज़ल

तलाश जिस नूर की है तुझ को छुपा है तेरे बदन के अंदर

पंडित जवाहर नाथ साक़ी

;

तलाश जिस नूर की है तुझ को छुपा है तेरे बदन के अंदर
ज़ुहूर-ए-आलम हुआ उसी से वो है हर इक जान-आे-तन के अंदर

तुझे ये बे-सर्फ़ा जद्द-ओ-कद है कशाकशी में भी शद्द-ओ-मद है
नफ़स की तुझ को अगर मदद है सफ़र है इस जा वतन के अंदर

तुझे वहाँ से गुरेज़ ओ रम है तलाश अब आहू-ए-हरम है
चला है वो राह जो भरम है, है मुश्क-ए-नाफ़ा ख़ुतन के अंदर

जहाँ में सारा है नूर तेरा हर एक शय में ज़ुहूर तेरा
मगर तख़य्युल है दूर तेरा पड़ा है बैत-उल-हुज़न के अंदर

तू ही मुहक़क़िक़ तू ही मुजद्दिद बना है तू आप ही मुक़ल्लिद
तू रस्म-ओ-रह का हुआ मुक़य्यद फँसा है ख़ुद मा-ओ-मन के अंदर

क़दीम वीराँ-कदा है हस्ती समझ इसे है फ़ना की बस्ती
ये तेरी हिम्मत की सब है पस्ती ज़ुबूँ है दहर-ए-कुहन के अंदर

अजीब अहमक़ है और सादा सवार हो कर हुआ पियादा
किधर चला ये नहीं है जादा तू क्यूँ भटकता है बन के अंदर

ये आतिश-ए-इश्क़ की है जिद्दत कि दिल में पैदा हुई है रिक़्क़त
ये सोज़-ए-ग़म की मिली है लज़्ज़त मज़ा है दिल की जलन के अंदर

हुआ है मस्त-ए-शराब-ए-गुलगूँ अकड़ रहा है वो सर्व-ए-मौज़ूँ
दिखा के हम को ये जाम-ए-वाज़ूँ ख़जिल किया अंजुमन के अंदर

हुआ है सरशार वहम-ए-'साक़ी' तुझे नहीं शौक़-ए-वस्ल बाक़ी
हवा-ए-दुनिया का है मिराक़ी पड़ा है आवागवन के अंदर