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तलाश-ए-रंग में आवारा मिस्ल-ए-बू हूँ मैं | शाही शायरी
talash-e-rang mein aawara misl-e-bu hun main

ग़ज़ल

तलाश-ए-रंग में आवारा मिस्ल-ए-बू हूँ मैं

आरज़ू लखनवी

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तलाश-ए-रंग में आवारा मिस्ल-ए-बू हूँ मैं
गुज़र के आप से अपनी ही जुस्तुजू हूँ मैं

नफ़स है सख़्ती-ए-क़ैद-ए-हयात का ज़ामिन
निकल सके जो न फाँसी से वो गुलू हूँ मैं

निशान-ए-हस्ती फ़ानी है दाग़-ए-नाकामी
ख़ुद अपनी आँख से टपका हुआ लहू हूँ मैं

मिसाल-ए-पैकर-ए-सीमाब-ए-इज़्तिराब मुदाम
प-ए-निगाह-ए-करम शरह-ए-आरज़ू हूँ मैं

मिरी ज़बाँ पे हैं अंदेशाहा-ए-नाकामी
समझ रहे वो दिल में कि हीला-जू हूँ मैं

अभी है आब-ए-नदामत सर-ए-जबीं बाक़ी
नमाज़ ऐसे मैं पढ़ लूँ कि बा-वज़ू हूँ मैं

हूँ कुछ न होने पे भी काएनात का हासिल
कि अपना शौक़ नहीं तेरी आरज़ू हूँ मैं

मिसाल-ए-मअ'नी-ए-बे-लफ़्ज़-ओ-लफ़्ज़-ए-बे-मअ'नी
जो तेरे दिल में नहीं है वो 'आरज़ू' हूँ मैं