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तजल्लियों से ग़म-ए-ए'तिबार ले के उठा | शाही शायरी
tajalliyon se gham-e-etibar le ke uTha

ग़ज़ल

तजल्लियों से ग़म-ए-ए'तिबार ले के उठा

नुशूर वाहिदी

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तजल्लियों से ग़म-ए-ए'तिबार ले के उठा
सुकूँ नहीं था तो दिल का क़रार ले के उठा

गुज़रने वाले मुसाफ़िर से की उमीद-ए-वफ़ा
हर एक रह से कोई इंतिज़ार ले के उठा

किए जुनूँ में यहाँ तक सुजूद-ए-मजबूरी
कि आस्ताँ से तिरे इख़्तियार ले के उठा

चमन में ग़म की बहारें गुज़ार दीं मैं ने
वहाँ से अपने नशेमन के ख़ार ले के उठा

ख़िज़ाँ-नसीब है दुनिया उसे ख़बर क्या है
बहार ले के जो बैठा बहार ले के उठा

चमन से क्यूँ न तअ'ल्लुक़ हो सूरत-ए-शबनम
वो गिर पड़ा जो अलाएक का बार ले के उठा

हयात-ख़ेज़ है हर रंग में सबात 'नुशूर'
जो संग हो के भी बैठा शरार ले के उठा