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तह-ए-अफ़्लाक ही सब कुछ नहीं है | शाही शायरी
tah-e-aflak hi sab kuchh nahin hai

ग़ज़ल

तह-ए-अफ़्लाक ही सब कुछ नहीं है

अरमान नज्मी

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तह-ए-अफ़्लाक ही सब कुछ नहीं है
ज़मीं की ख़ाक ही सब कुछ नहीं है

कई सच्चाइयाँ हैं मावरा भी
हद-ए-इदराक ही सब कुछ नहीं है

दिल-ओ-जाँ की भी निस्बत है जुनूँ से
क़बा-ए-चाक ही सब कुछ नहीं है

ये गुल बूटे बहुत दिलकश हैं लेकिन
सर-ए-पोशाक ही सब कुछ नहीं है

अभी है इब्तिदा मश्क़-ए-सितम की
लब-ए-सफ़्फ़ाक ही सब कुछ नहीं है