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तअय्युन तसलसुल है नक़्श-ए-बदन का | शाही शायरी
tayyun tasalsul hai naqsh-e-badan ka

ग़ज़ल

तअय्युन तसलसुल है नक़्श-ए-बदन का

पंडित जवाहर नाथ साक़ी

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तअय्युन तसलसुल है नक़्श-ए-बदन का
उसी से तअ'ल्लुक़ है ये जान-आे-तन का

तसव्वुफ़ तबद्दुल है आदात-ए-बद का
तअर्रुफ़ नतीजा है ख़ुल्क़-ए-हसन का

वही गुल शजर है वही बोस्ताँ है
वही आप है बाग़बाँ इस चमन का

वो बे-कैफ़-ओ-कम है क़दीम-ओ-अज़ल से
उसी से है ये नक़्श-ए-दहर-ए-कुहन का

तवल्ला समझ हम-ज़बानी से बेहतर
तअश्शुक़ हुआ हम-दम-ओ-हम-सुख़न का

रम-ओ-शौक़ की भी अजाइब कशिश है
बुरा हाल है आशिक़-ए-ख़स्ता-तन का

जो सिर्र-ए-ख़फ़ी है वो ऐन-ए-जली है
खुला आज उक़्दा ये सिर्र-ए-दहन का

लताइफ़ में मुज़्मर है तस्वीर-ए-वहदत
ये ख़ल्वत में पैदा है लुत्फ़ अंजुमन का

नज़र बर-क़दम है तरीक़-ए-तसव्वुर
रम-ओ-शौक़ जादा है सिर्र-ओ-एलन का

निहाँ से अयाँ है अयाँ में निहाँ है
ये जादा मिला है सफ़र दर-वतन का

सुलूक-ए-तरीक़त है आफ़ाक़-ओ-अन्फ़ुस
कि जल्वा है तनज़ीह में सीम-तन का

वो बे-पर्दा भी पर्दा-पोश-ए-नज़र है
हिजाब आ गया है हमें हुस्न-ए-ज़न का

कभी शाद-ओ-ख़ंदाँ कभी ज़ार-ओ-नालाँ
तमाशा है 'साक़ी' के दीवाना-पन का