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तालिब-ए-इश्क़ है क्या सालिक-ए-उर्यां न हुआ | शाही शायरी
talib-e-ishq hai kya salik-e-uryan na hua

ग़ज़ल

तालिब-ए-इश्क़ है क्या सालिक-ए-उर्यां न हुआ

पंडित जवाहर नाथ साक़ी

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तालिब-ए-इश्क़ है क्या सालिक-ए-उर्यां न हुआ
क़ुर्ब महजूर हुआ वासिल-ए-जानाँ न हुआ

हैं जुनूँ जोश वही जज़्ब का निस्याँ न हुआ
क़तरा दरिया जो हुआ आइना हैराँ न हुआ

क्या सिया-मस्त हुआ कैफ़ में रक़्साँ न हुआ
जाम-ए-सर-जोश से भी सालिक-ए-वज्दाँ न हुआ

वस्ल-ए-मौऊ'द से आशोब-ए-तमन्ना है अदम
बे-तमन्ना तिरा आशुफ़्ता-ए-हिज्राँ न हुआ

मैं जो मज्ज़ूब-ए-अज़ल था न गई मह्विय्यत
सुब्ह-ए-महशर से मिरा चाक गरेबाँ न हुआ

दीद-ए-बे-चून-ओ-चिगूँ सैर-ए-लताएफ़ में जो थी
महव-ए-आईना-ए-नैरंगी-ए-अल्वाँ न हुआ

वुसअ'त-ए-मशरब-ए-रिंदाँ है तिलिस्म-ए-हैरत
ये किसी तंग फ़ज़ा दिल का बयाबाँ न हुआ

सूरत-ए-हाल ने मशहूद किया कैफ़-ए-बतूँ
राज़-ए-सर-बस्ता मिरा गिर्या-ए-पिनहाँ न हुआ

जम्अ' क्यूँ फ़र्क़ हो नैरंग-ए-मज़ाहिर के सबब
तेरा मंज़ूर-ए-नज़र आँखों से पिन्हाँ न हुआ

आँख से आँख लड़ी चीन-ए-जबीं महव हुई
शौक़-ए-दीदार मिरा जल्वा-पशेमाँ न हुआ

जाम-ए-सरशार में कुछ कैफ़ न आया हम को
'साक़ी'-ए-मस्त जो सर-हल्क़ा-ए-मस्ताँ न हुआ