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ता-अबद एक ही चर्चा होगा | शाही शायरी
ta-abad ek hi charcha hoga

ग़ज़ल

ता-अबद एक ही चर्चा होगा

जमीलुद्दीन आली

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ता-अबद एक ही चर्चा होगा
कोई हम सा कोई तुम सा होगा

इसी तारीक ज़मीं का मंज़र
चाँद पर चाँदनी जैसा होगा

सूरज आया है मिरी सम्त मगर
दूसरी सम्त अँधेरा होगा

काश पहले से कोई बतला दे
किस तरह ज़िक्र हमारा होगा

ऐसे बेगाना न सुनना लोगो
ये भी अफ़्साना किसी का होगा

वो नहीं आएगा इस महफ़िल में
दूर ही दूर से सुनता होगा

आई बे-साख़्ता हर शे'र पे दाद
कितने मा'नी नहीं समझा होगा

कौन था जिस ने रखी तुझ से उम्मीद
हाँ तो वो शख़्स मुझी सा होगा

कौन था अब्र जो बन कर बरसा
हाँ तो वो तुझ को तरसता होगा

कौन था जिस से हुई तय मंज़िल
हाँ तो पहले वो भटकता होगा

कौन था जिस से ये शो'ले भड़के
हाँ तो वो ख़ूब सुलगता होगा

तुम रहो चुप कि ग़ज़ल-ख़्वाँ 'आली'
न बुरा होगा न अच्छा होगा