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सूद-ओ-ज़ियाँ के बाब में हारे घड़ी घड़ी | शाही शायरी
sud-o-ziyan ke bab mein haare ghaDi ghaDi

ग़ज़ल

सूद-ओ-ज़ियाँ के बाब में हारे घड़ी घड़ी

सलमान अंसारी

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सूद-ओ-ज़ियाँ के बाब में हारे घड़ी घड़ी
साँसों के क़र्ज़ हम ने उतारे घड़ी घड़ी

चलती रही हवा-ए-मुख़ालिफ़ तमाम रात
गिरते रहे फ़लक से सितारे घड़ी घड़ी

थमती है रोज़ गर्दिश-ए-साग़र मगर ख़ुमार
चलता है साथ साथ हमारे घड़ी घड़ी

अब हिज्र न विसाल न सौदा तिरे बग़ैर
दुखता है दिल भी दर्द के मारे घड़ी घड़ी

ऐ रख़्श-ए-नाज़ मुड़ के ज़रा देख तो सही
यादों के दर से कौन पुकारे घड़ी घड़ी

'सलमान' फिर चला है उसी बज़्म-ए-नाज़ में
कम-ज़र्फ़ अपने बाल सँवारे घड़ी घड़ी