सुलग उठी है कोई आग सी हवाओं में
बदल गई हैं बहारें मिरी ख़िज़ाओं में
न आई रास बनावट की ज़िंदगी मुझ को
मैं शहर छोड़ के फिर आ गया हूँ गाँव में
क़दम क़दम पे नया इक ख़ुदा नज़र आया
न जाने कौन सा बर-हक़ है इन ख़ुदाओं में
कोई उमीद की बारिश का एहतिमाम करो
मैं जल रहा हूँ ग़म-ओ-यास की चिताओं में
बहुत कड़ा है मोहब्बत के रास्तों का सफ़र
जफ़ा की धूप छुपी है वफ़ा की छाँव में
ग़ज़ल
सुलग उठी है कोई आग सी हवाओं में
जलील ’आली’

