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सुलग उठी है कोई आग सी हवाओं में | शाही शायरी
sulag uThi hai koi aag si hawaon mein

ग़ज़ल

सुलग उठी है कोई आग सी हवाओं में

जलील ’आली’

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सुलग उठी है कोई आग सी हवाओं में
बदल गई हैं बहारें मिरी ख़िज़ाओं में

न आई रास बनावट की ज़िंदगी मुझ को
मैं शहर छोड़ के फिर आ गया हूँ गाँव में

क़दम क़दम पे नया इक ख़ुदा नज़र आया
न जाने कौन सा बर-हक़ है इन ख़ुदाओं में

कोई उमीद की बारिश का एहतिमाम करो
मैं जल रहा हूँ ग़म-ओ-यास की चिताओं में

बहुत कड़ा है मोहब्बत के रास्तों का सफ़र
जफ़ा की धूप छुपी है वफ़ा की छाँव में