सुकूत-ए-ख़ौफ़ यहाँ कू-ब-कू पुकारता है
न उस की तेग़ न मेरा लहू पुकारता है
मैं अपनी खोई हुई लौह की तलाश में हूँ
कोई तिलिस्म मुझे चार-सू पुकारता है
वो मुझ में बोलने वाला तो चुप है बरसों से
ये कौन है जो तिरे रू-ब-रू पुकारता है
निदा-ए-कोह बहुत खींचती है अपनी तरफ़
मिरे ही लहजे में वो हीला-जू पुकारता है
हमारा अहद है बे-बर्ग-ओ-बार शाख़ों से
अगरचे क़ाफ़िला-ए-रंग-ओ-बू पुकारता है
कि जैसे मैं सर-ए-दरिया घिरा हूँ नेज़ों में
कि जैसे ख़ेमा-ए-सहरा से तू पुकारता है
ग़ज़ल
सुकूत-ए-ख़ौफ़ यहाँ कू-ब-कू पुकारता है
इरफ़ान सिद्दीक़ी

