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सुब्ह-ए-तरब तो मस्त-ओ-ग़ज़ल-ख़्वाँ गुज़र गई | शाही शायरी
subh-e-tarab to mast-o-ghazal-KHwan guzar gai

ग़ज़ल

सुब्ह-ए-तरब तो मस्त-ओ-ग़ज़ल-ख़्वाँ गुज़र गई

हसन नईम

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सुब्ह-ए-तरब तो मस्त-ओ-ग़ज़ल-ख़्वाँ गुज़र गई
शाम-ए-अलम जो आई तो आ कर ठहर गई

देखा किसी ने औज-ए-तसव्वुर न औज-ए-फ़न
पिन्हाँ था दाग़-ए-ऐब तो सब की नज़र गई

याद-ए-ख़ुदा से बाब-ए-हरम तक खुला नहीं
याद-ए-बुताँ से दिल पे क़यामत गुज़र गई

तड़पा क़फ़स में कौन जो ऐ सुब्ह-ए-नौ-बहार
रू-ए-गुल-ओ-गियाह सबा चश्म-तर गई

इतना दिल-ए-'नईम' को वीराँ न कर हिजाज़
रोएगी मौज-ए-गंग जो उस तक ख़बर गई