सोज़-ए-दिल हर शब हमें अपना ही बतलाती है शम्अ
दिल का जलना हम दिखाते हैं तो जल जाती है शम्अ
ये धुआँ नीं दर्द से भरती है आहें जाँ-गुदाज़
किस नज़ाकत सात एक एक अश्क टपकाती है शम्अ
सर-सिते पाँव तलक ग़र्क़-ए-अरक़ बे-वज्ह नीं
बे-हिजाब उस शोला-रू को देख शरमाती है शम्अ
शोला-रू के देखने की याँ तलक मुश्ताक़ है
पाँव तक सर से लगा कर आँख बन जाती है शम्अ
'इश्क़' परवाने के मातम में वो अपने बाल खोल
सोज़-ए-दिल से आह क्या रोने में भर जाती है शम्अ
ग़ज़ल
सोज़-ए-दिल हर शब हमें अपना ही बतलाती है शम्अ
इश्क़ औरंगाबादी

