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सोते हैं वो आईना ले कर ख़्वाबों में बाल बनाते हैं | शाही शायरी
sote hain wo aaina le kar KHwabon mein baal banate hain

ग़ज़ल

सोते हैं वो आईना ले कर ख़्वाबों में बाल बनाते हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

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सोते हैं वो आईना ले कर ख़्वाबों में बाल बनाते हैं
सादा से परिंदे की ख़ातिर क्या रेशमी जाल बनाते हैं

उम्मीद की सूखती शाख़ों से सारे पत्ते झड़ जाएँगे
इस ख़ौफ़ से अपनी तस्वीरें हम साल-ब-साल बनाते हैं

ज़ख़्मों को छुपाने की ख़ातिर कपड़े ही बदलना छोड़ दिया
पूछो तो सही हम किस के लिए अपना ये हाल बनाते हैं

वो बोलती आँखें मिलते ही झुक जाती हैं ख़ामोशी से
हम उन के जवाब से फिर अपना इक और सवाल बनाते हैं