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सोचते हैं तो कर गुज़रते हैं | शाही शायरी
sochte hain to kar guzarte hain

ग़ज़ल

सोचते हैं तो कर गुज़रते हैं

परवीन फ़ना सय्यद

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सोचते हैं तो कर गुज़रते हैं
हम तो मंजधार में उतरते हैं

मौत से खेलते हैं हम लेकिन
ग़ैर की बंदगी से डरते हैं

जान अपनी तो है हमें भी अज़ीज़
फिर भी शो'लों पे रक़्स करते हैं

दिल-फ़िगारों से पूछ कर देखो
कितनी सदियों में घाव भरते हैं

जिन को है इंदिमाल-ए-ज़ख़्म अज़ीज़
आमद-ए-फ़स्ल-ए-गुल से डरते हैं

छुप के रोते हैं सब की नज़रों से
जो गिला है वो ख़ुद से करते हैं