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सोचो तो कुछ न समझो समझो तो कुछ न बोलो | शाही शायरी
socho to kuchh na samjho samjho to kuchh na bolo

ग़ज़ल

सोचो तो कुछ न समझो समझो तो कुछ न बोलो

ख़ालिद अहमद

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सोचो तो कुछ न समझो समझो तो कुछ न बोलो
फिर चुप का हुस्न देखो बेकार लब न खोलो

नौहा-कुनाँ हवाओ शोला-ब-जाँ फ़ज़ाओ
देखो वो जा रहा है जी भर के उस को रो लो

डाले रहें बसेरे ख़्वाबों भरे अँधेरे
महलों की आस रक्खो कुटिया के पट न खोलो

कौंदे लपक रहे हैं जज़्बे चमक रहे हैं
सदियाँ बिलक रही हैं लम्हों को यूँ न रोलो

हर फ़ासला बड़ा है हर मरहला कड़ा है
सूरज अगर है पीछे साए के साथ हो लो

गुल हूँ बिखर न जाऊँ पल हूँ गुज़र न जाऊँ
तकमील कर लो अपनी आग़ोश में समो लो

दुनिया फ़क़त गुमाँ है सब कुछ दरून-ए-जाँ है
जागो ज़रूर 'ख़ालिद' आँखें मगर न खोलो