सियाह दर्द का ये साएबान गिर जाए
हमीं पे टूट के काश आसमान गिर जाए
ख़राबा-ए-दिल-ए-तन्हा न देखा जाएगा
हमीं मकीं हैं तो हम पर मकान गिर जाए
मैं इस लरज़ती सी दीवार-ए-दिल का नौहा हूँ
जो कहते कहते कोई दास्तान गिर जाए
सँभल सँभल के उठा बार-ए-बेकसी का पहाड़
तिरे जिगर पे न सर की चटान गिर जाए
न ऐसे लौंग घुमा नाक में हसीं मुटियार
जो हल चलाते हैं कोई किसान गिर जाए
दुआ-ए-नीम-शबी और यक़ीन-ए-बे-असरी
कि जैसे तीर से पहले कमान गिर जाए
'मुसव्विर' ऐसी हुई तंग ये ज़मीं हम पर
बढ़ीं जिधर भी वहीं आसमान गिर जाए
ग़ज़ल
सियाह दर्द का ये साएबान गिर जाए
मुसव्विर सब्ज़वारी

