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सितम है वो फिर बद-गुमाँ हो रहा है | शाही शायरी
sitam hai wo phir bad-guman ho raha hai

ग़ज़ल

सितम है वो फिर बद-गुमाँ हो रहा है

आशिक़ अकबराबादी

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सितम है वो फिर बद-गुमाँ हो रहा है
पस-ए-इम्तिहाँ इम्तिहाँ हो रहा है

ख़ुशी क्यूँ न हो क़त्ल होने की मुझ को
वो ना-मेहरबाँ मेहरबाँ हो रहा है

तसद्दुक़ तुझी पर ज़मीं हो रही है
तुझी पर फ़िदा आसमाँ हो रहा है

मुझे हिचकियों ने ख़बर दी है आ कर
मिरा ज़िक्र जो कुछ वहाँ हो रहा है

चलो सैर कर आएँ जन्नत की 'आशिक़'
अजब कुछ तमाशा वहाँ हो रहा है