सितम है वो फिर बद-गुमाँ हो रहा है
पस-ए-इम्तिहाँ इम्तिहाँ हो रहा है
ख़ुशी क्यूँ न हो क़त्ल होने की मुझ को
वो ना-मेहरबाँ मेहरबाँ हो रहा है
तसद्दुक़ तुझी पर ज़मीं हो रही है
तुझी पर फ़िदा आसमाँ हो रहा है
मुझे हिचकियों ने ख़बर दी है आ कर
मिरा ज़िक्र जो कुछ वहाँ हो रहा है
चलो सैर कर आएँ जन्नत की 'आशिक़'
अजब कुछ तमाशा वहाँ हो रहा है
ग़ज़ल
सितम है वो फिर बद-गुमाँ हो रहा है
आशिक़ अकबराबादी

