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सितारा-चश्म है और मेहरबाँ है | शाही शायरी
sitara-chashm hai aur mehrban hai

ग़ज़ल

सितारा-चश्म है और मेहरबाँ है

शाहिदा हसन

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सितारा-चश्म है और मेहरबाँ है
वो मेरी ख़ाक पर अब आसमाँ है

तिरे आगे मिरा ख़ामोश होना
यक़ीं के टूट जाने का समाँ है

हद्द-ए-आइंदगाँ पर एक लम्हा
मिरी मजबूरियों का राज़-दाँ है

हवा से रिश्ता-ए-जाँ क्या निभाऊँ
किसी की याद ही जब बद-गुमाँ है

तिरा मिलना न मिलना एक ही था
ये तन्हाई तो इक जू-ए-रवाँ है