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सिखाएँ दस्त-ए-तलब को अदा-ए-बेबाकी | शाही शायरी
sikhaen dast-e-talab ko ada-e-bebaki

ग़ज़ल

सिखाएँ दस्त-ए-तलब को अदा-ए-बेबाकी

मजरूह सुल्तानपुरी

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सिखाएँ दस्त-ए-तलब को अदा-ए-बेबाकी
पयाम-ए-ज़ेर-लबी को सला-ए-आम करें

ग़ुलाम रह चुके तोड़ें ये बंद-ए-रुस्वाई
कुछ अपने बाज़ू-ए-मेहनत का एहतिराम करें

ज़मीं को मिल के सँवारें मिसाल-ए-रू-ए-निगार
रुख़-ए-निगार से रौशन चराग़-ए-बाम करें

फिर उठ के गर्म करें कारोबार-ए-ज़ुल्फ़-ओ-जुनूँ
फिर अपने साथ उसे भी असीर-ए-दाम करें

मिरी निगाह में है अर्ज़-ए-मास्को 'मजरूह'
वो सरज़मीं कि सितारे जिसे सलाम करें