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सीखा जो क़लम से न-ए-ख़ाली का बजाना | शाही शायरी
sikha jo qalam se na-e-Khaali ka bajaana

ग़ज़ल

सीखा जो क़लम से न-ए-ख़ाली का बजाना

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

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सीखा जो क़लम से न-ए-ख़ाली का बजाना
कर नग़्मा 'बक़ा' फ़िक्रत-ए-आली का बजाना

तस्मा मिरे मत दिल पे दिवाली का बजाना
ये लट जो है चाबुक उसी काली का बजाना

मारा किए मुतरिब ब-चुगाँ दिल पे थपेड़े
सीखे इसी तबले पे वो ताली का बजाना

उल्फ़त में तिरी ऐ बुत-ए-बे-मेहर-ओ-मोहब्बत
आया हमें इक हाथ से ताली का बजाना

ले मोल मिरे दिल का वो जब साग़र-ए-नाज़ुक
याद आवे न काश उस को सिफ़ाली का बजाना

इस नाला-ए-बे-सौत ने हैरत में सिखाया
साज़ अब मुझे तस्वीर-ए-निहाली का बजाना

बस ऐ ग़म-ए-ग़म्माज़ मिरी आह-ए-जिगर से
ला'नत है तिरा बाम पे थाली का बजाना

बे-साक़ी-ओ-मय सोच में है काम हमारा
बैठे सिर-ए-नाख़ुन से प्याली का बजाना

इस कूदक-ए-बे-होश का आफ़त है शब उठ कर
ठेकों पे मिरी आह के ताली का बजाना

सुनता हूँ किसी पोच की जब दफ़-ज़नी-ए-फ़िक्र
आता है मुझे याद डफ़ाली का बजाना

करता है 'बक़ा' नाला तो कर झाँज में दिल से
बे-झाँज है क्या इस दफ़-ए-ख़ाली का बजाना