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शुऊ'र-ए-फ़ितरत-ए-इंसाँ का है बेदार हो जाना | शाही शायरी
shuur-e-fitrat-e-insan ka hai bedar ho jaana

ग़ज़ल

शुऊ'र-ए-फ़ितरत-ए-इंसाँ का है बेदार हो जाना

शोला करारवी

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शुऊ'र-ए-फ़ितरत-ए-इंसाँ का है बेदार हो जाना
कहीं मजबूर बन जाना कहीं मुख़्तार हो जाना

दिखा कर इक झलक उस का पस-ए-दीवार हो जाना
यही तो आशिक़ों के हक़ में है तलवार हो जाना

मिरे सोए हुए जज़्बात का बेदार हो जाना
किसी बेहोश का है ख़ुद-बख़ुद हुश्यार हो जाना

करूँ मैं ख़ून का दा'वा तो पेश-ए-दावर-ए-महशर
क़यामत है मगर क़ातिल से आँखें चार हो जाना

शिकस्त-ए-बे-सुतून-ओ-मौज-ए-जू-ए-शीर शाहिद हैं
नहीं आसान राह-ए-इश्क़ का हमवार हो जाना

शरफ़ है ये फ़क़त इक अशरफ़-उल-मख़्लूक़ इंसाँ का
फ़ज़ा-ए-आलम-ए-इम्काँ की हद से पार हो जाना

ब-क़ौल-ए-'मीर' ये इंसान पर तोहमत-तराशी है
किसी मजबूर का मुमकिन नहीं मुख़्तार हो जाना

यूँ ही याद-ए-ख़ुदा आ जाती है मुझ को कभी 'शो'ला'
कि जैसे सोते सोते ख़्वाब से बेदार हो जाना