शुरूअ' सिलसिला-ए-दीद करने वाला था
तआरुफ़-ए-रुख़-ए-तौहीद करने वाला था
ख़ुद उस की ज़ूद लिसानी ने उस को गुंग किया
वो मेरे हाल पे तन्क़ीद करने वाला था
मिज़ाज-ए-यार ने बख़्शी थी ऐसी यक-रंगी
कहाँ मैं ग़ैर की तक़लीद करने वाला था
तू मुंतहा को पहुँच कर भी सिफ़्र है अब तक
तुझे मैं वाक़िफ़-ए-तम्हीद करने वाला था
हमारी साल में दो बार जान जाती है
वो शख़्स रोज़ ही इक ईद करने वाला था
वो मेरे वा'ज़ से मस्जिद में जब सँभल न सका
शराब-ख़ाने में ताकीद करने वाला था
बचा के फ़िक्र को तल्ख़ाबा-ए-तवारुद से
ग़ज़ल को ख़ूगर-ए-ता'क़ीद करने वाला था
वो हम-पियाला भी था ख़्वाजा-ताश भी 'काविश'
जो बात बात पे तरदीद करने वाला था
ग़ज़ल
शुरूअ' सिलसिला-ए-दीद करने वाला था
काविश बद्री

