शिकस्ता अक्स था वो या ग़ुबार-ए-सहरा था
वो मैं नहीं था जो ख़ुद अपने घर में रहता था
अजीब शर्त-ए-सफ़र थी मिरे लिए कि मुझे
सियाह धूप में रौशन चराग़ रखना था
फ़सील-ए-संग से मुझ को उतारने आया
वो इक सितारा जो मैं ने कभी न देखा था
न जाने कौन से मौसम में जी रहा था मैं
कि मेरी प्यास थी मेरी न मेरा दरिया था
शजर की छाँव से बाहर है रिज़्क़ ताइर का
वो साहिलों पे न ठहरा कभी जो प्यासा था
किसे पुकार रहा था मिरा अधूरापन
मैं गर्म रेत पे ताज़ा गुलाब रखता था
हज़ार कम-सुख़नी दरमियाँ रही फिर भी
वो मुझ से आन मिला था तो रंग बरसा था
मैं बुझ गया तो मिरे जिस्म-ओ-जाँ खुले मुझ पर
चराग़ और था कोई जो मुझ में जलता था
वो अपने घर में उजाला न कर सका 'जाज़िब'
तमाम रात जो सूरज के ख़्वाब रखता था
ग़ज़ल
शिकस्ता अक्स था वो या ग़ुबार-ए-सहरा था
जाज़िब क़ुरैशी

