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शिकस्ता अक्स था वो या ग़ुबार-ए-सहरा था | शाही शायरी
shikasta aks tha wo ya ghubar-e-sahra tha

ग़ज़ल

शिकस्ता अक्स था वो या ग़ुबार-ए-सहरा था

जाज़िब क़ुरैशी

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शिकस्ता अक्स था वो या ग़ुबार-ए-सहरा था
वो मैं नहीं था जो ख़ुद अपने घर में रहता था

अजीब शर्त-ए-सफ़र थी मिरे लिए कि मुझे
सियाह धूप में रौशन चराग़ रखना था

फ़सील-ए-संग से मुझ को उतारने आया
वो इक सितारा जो मैं ने कभी न देखा था

न जाने कौन से मौसम में जी रहा था मैं
कि मेरी प्यास थी मेरी न मेरा दरिया था

शजर की छाँव से बाहर है रिज़्क़ ताइर का
वो साहिलों पे न ठहरा कभी जो प्यासा था

किसे पुकार रहा था मिरा अधूरापन
मैं गर्म रेत पे ताज़ा गुलाब रखता था

हज़ार कम-सुख़नी दरमियाँ रही फिर भी
वो मुझ से आन मिला था तो रंग बरसा था

मैं बुझ गया तो मिरे जिस्म-ओ-जाँ खुले मुझ पर
चराग़ और था कोई जो मुझ में जलता था

वो अपने घर में उजाला न कर सका 'जाज़िब'
तमाम रात जो सूरज के ख़्वाब रखता था