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शौक़-ए-वारफ़्ता को मलहूज़-ए-अदब भी होगा | शाही शायरी
shauq-e-warafta ko malhuz-e-adab bhi hoga

ग़ज़ल

शौक़-ए-वारफ़्ता को मलहूज़-ए-अदब भी होगा

सय्यद अमीन अशरफ़

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शौक़-ए-वारफ़्ता को मलहूज़-ए-अदब भी होगा
शर्त है माल-ए-अरब पेश-ए-अरब भी होगा

लब-ओ-रुख़्सार में होगी गुल-ओ-महताब की बात
आँख में तज़किरा-ए-बिंत-ए-इनब भी होगा

मान लेता है मिरी बात मिरा हीला-तराज़
और सब वा'दों में इक वादा-ए-शब भी होगा

इश्क़ वो शय है कि बर्फ़ीले निहाँ-ख़ानों में
सर्द पड़ जाए शरर-बार तो जब भी होगा

बे-तअल्लुक़ ही सही ये मगर उस शख़्स के पास
दिल जो लगता है तो लगने का सबब भी होगा

हर गली शहर की ग़ालीचा-ए-उश्शाक नहीं
ख़ून-ए-नाहक़ है तो फिर दाद-तलब भी होगा

क़हर दरवेश तो होता है ब-जान-ए-दरवेश
ज़ेर-ए-फ़रमान जो होता था सो अब भी होगा

कर्ब के ज़हर का मारा हुआ इंसान है ये
सर पे सौ बोझ मगर ख़ंदा-ब-लब भी होगा

इक असा पास न हो ज़ोम-ए-कलीमी भी हो
ऐसा लगता है कि ये कार-ए-अजब भी होगा

यूँ तो बे-आब हैं खे़मे ये जहाँ तक भी हैं
दिल ये कहता है कहीं अब्र-ए-तरब भी होगा