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शौक़-ए-ख़राश-ए-ख़ार मिरे दिल में रह गया | शाही शायरी
shauq-e-KHarash-e-Khaar mere dil mein rah gaya

ग़ज़ल

शौक़-ए-ख़राश-ए-ख़ार मिरे दिल में रह गया

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस

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शौक़-ए-ख़राश-ए-ख़ार मिरे दिल में रह गया
पा-ए-तलाश पहली ही मंज़िल में रह गया

मैं ज़मज़मा-सरा तो चमन से गया वले
अफ़्साना इक गिरोह-ए-अनादिल में रह गया

ज़ंजीर-ए-मौज पाँव में आ कर लिपट गई
तूफ़ानियों का ध्यान ही साहिल में रह गया

तस्वीर उस की कैसे खिंची मानी-ए-ख़याल
हैरान जिस की शक्ल-ओ-शमाइल में रह गया

काम अपना तो तमाम किया यास ने 'हवस'
जी इश्तियाक़-ए-ख़ंजर-ए-क़ातिल में रह गया