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शर्मिंदा अपनी जेब को करता नहीं हूँ मैं | शाही शायरी
sharminda apni jeb ko karta nahin hun main

ग़ज़ल

शर्मिंदा अपनी जेब को करता नहीं हूँ मैं

राजेश रेड्डी

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शर्मिंदा अपनी जेब को करता नहीं हूँ मैं
बाज़ार-ए-आरज़ू से गुज़रता नहीं हूँ मैं

पहचान ही न पाऊँ ख़ुद अपने ही अक्स को
इतना भी आइने में सँवरता नहीं हूँ मैं

उन कामों की बनाता हूँ फ़िहरिस्त बार बार
जो काम मुझ को करने हैं करता नहीं हूँ मैं