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शरीक-ए-सोज़-ए-दरूँ जब से हो गए अल्फ़ाज़ | शाही शायरी
sharik-e-soz-e-darun jab se ho gae alfaz

ग़ज़ल

शरीक-ए-सोज़-ए-दरूँ जब से हो गए अल्फ़ाज़

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

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शरीक-ए-सोज़-ए-दरूँ जब से हो गए अल्फ़ाज़
नवा-ए-दर्द में शो'ले पिरो गए अल्फ़ाज़

सुना के दास्ताँ दिल-दोज़ वारदातों की
न जाने कितनों के दामन भिगो गए अल्फ़ाज़

कभी कभी तो कुछ ऐसा भी इत्तिफ़ाक़ हुआ
तड़प के जाग उठे अरमाँ तो सो गए अल्फ़ाज़

मिली न जब उन्हें इबलाग़ की तवानाई
तो आप अपने मुक़द्दर को रो गए अल्फ़ाज़

उठे तो सारे ज़माने की बन गए आवाज़
दबे तो आबरू अपनी डुबो गए अल्फ़ाज़

ख़तीब-ए-शहर ने की बात दोस्ती की मगर
दिलों में तुख़्म अदावत के बो गए अल्फ़ाज़

ग़ज़ल-सराई-ए-'मंशा' पे यूँ हुआ महसूस
कि जैसे रूह के अंदर समो गए अल्फ़ाज़