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शम्अ' की आग़ोश ख़ाली कर के परवाना चला | शाही शायरी
shama ki aaghosh Khaali kar ke parwana chala

ग़ज़ल

शम्अ' की आग़ोश ख़ाली कर के परवाना चला

रज़ा जौनपुरी

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शम्अ' की आग़ोश ख़ाली कर के परवाना चला
आगे आगे थी हक़ीक़त पीछे अफ़्साना चला

कौन दीवाना था जो हमराह दीवाना चला
शक्ल-ए-गर्द-ए-रहगुज़र कुछ दूर वीराना चला

हल्का-ए-सूद-ज़ियाँ से हो के बेगाना चला
बे-नियाज़ाना था आया बे-नियाज़ाना चला

ये भी इक रस्म-ए-तअ'ल्लुक़ है ब-क़द्र-ए-आगही
बात का'बे की जो आई ज़िक्र-ए-बुत-ख़ाना चला

कुछ इशारे कुछ किनाए कुछ ख़मोशी कुछ बयान
गुफ़्तुगू का सिलसिला भी राज़-दाराना चला

लन-तरानी क्या बुरी थी बहर-ए-तक़रीब-ए-सुख़न
क्यूँ न ले कर फिर कोई ज़ौक़-ए-कलीमाना चला