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शम्अ भी इस सफ़ा से जलती है | शाही शायरी
shama bhi is safa se jalti hai

ग़ज़ल

शम्अ भी इस सफ़ा से जलती है

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

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शम्अ भी इस सफ़ा से जलती है
तेरे रुख़ पर निगह फिसलती है

ख़ाक उड़ाती है ऐ सबा मेरी
बे-अदब किस तरह से चलती है

वो न आया तो जान जाएँगे
कब तबीअत मिरी बहलती है

दिल निकलता है उस के गेसू से
नागनी देखो मन उगलती है

निगह-ए-गर्म यार देखे है
कब किसी से ये आँख जलती है

इक परी-रू पे 'बर्क़' मरता हूँ
जान उस पर मिरी निकलती है