EN اردو
शहर-ए-निगाराँ में फिरते हैं हम आवारा रात ढले | शाही शायरी
shahr-e-nigaran mein phirte hain hum aawara raat Dhale

ग़ज़ल

शहर-ए-निगाराँ में फिरते हैं हम आवारा रात ढले

शाहिद इश्क़ी

;

शहर-ए-निगाराँ में फिरते हैं हम आवारा रात ढले
शायद कोई दरीचा वा हो शायद कोई दीप जले

कोई ग़म-आगीं नग़्मा छेड़े कोई 'मीर' के शे'र पढ़े
कम कम दर्द की कलियाँ महकें पल पल ग़म की रात ढले

वीराँ वीराँ दिल की बस्ती सूनी सूनी राह-ए-वफ़ा
ऐसे कठिन रस्ते पे कोई दो-चार क़दम तो साथ चले

चाक हर इक गुल का दामन और आवारा हर मौज-ए-सबा
जैसे मुझ से मिल न सका हो कोई बिछड़ते वक़्त गले

ख़त्म हुआ है 'इश्क़ी' तुम पर सिलसिला-ए-वहशत-ज़दगाँ
शायद कोई शख़्स तुम्हारे बा'द वफ़ा का नाम न ले