मिरा दीवाना-पन फ़र्ज़ानगी से कम नहीं होता
कि मैं रोता हूँ पहरों और दामन नम नहीं होता
तिरा ग़म सहने वाले पर ज़माना मुस्कुराता है
मगर हर शख़्स की क़िस्मत में तेरा ग़म नहीं होता
मह-ओ-ख़ुर्शीद की ताबिंदगी कम होती रहती है
मगर दाग़-ए-तमन्ना का उजाला कम नहीं होता
अभी ऐ जोश-ए-गिर्या तू ने ये सोचा नहीं शायद
मोहब्बत का चमन मिन्नत-कश-ए-शबनम नहीं होता
क़यामत तक रहे साक़ी सलामत तेरा मय-ख़ाना
पिलाई है कुछ ऐसी कैफ़ जिस का कम नहीं होता
वक़ार-ए-इश्क़ पर उस दौर से भी हर्फ़ आता है
'अज़ीज़-वारसी' वो दर्द जो पैहम नहीं होता
ग़ज़ल
मिरा दीवाना-पन फ़र्ज़ानगी से कम नहीं होता
अज़ीज़ वारसी

