शग़्ल भी अशक-ए-ख़ूँ-फ़िशानी का
खेल है आग और पानी का
जल गया तूर ग़श हुए मूसा
खुल गया हाल लन-तरानी का
जान दे कर रह-ए-मोहब्बत में
मिल गया लुत्फ़-ए-ज़िंदगानी का
आह-ए-दिल ने दिया सहारा कुछ
जब बढ़ा ज़ोर ना-तवानी का
जब से तस्वीर तेरी देखी है
रंग-ए-रुख़ उड़ गया है मानी का
कुछ समझ में न आज तक आया
फ़ल्सफ़ा मौत-ओ-ज़िंदगानी का
ग़ज़ल
शग़्ल भी अशक-ए-ख़ूँ-फ़िशानी का
शोला करारवी

