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शब को जब यूरिश-ए-विज्दान में आ जाते हैं | शाही शायरी
shab ko jab yurish-e-wijdan mein aa jate hain

ग़ज़ल

शब को जब यूरिश-ए-विज्दान में आ जाते हैं

आमिर नज़र

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शब को जब यूरिश-ए-विज्दान में आ जाते हैं
तीरगी हम तिरे ऐवान में आ जाते हैं

जब नज़र उठती है आवाज़ के मीनारों पर
ज़ाविए दीदा-ए-हैरान में आ जाते हैं

कुछ हवाएँ भी उड़ा लाईं निशान-ए-निस्याँ
कुछ सितारे मिरे दामान में आ जाते हैं

तज़्किरा होने लगा ज़ब्त की मेहराबों पुर
शोर-ए-तल्ख़्विश मिरे कान में आ जाते हैं

आइने मंज़र-ए-शब-ताब लिए फिरते हैं
ज़लज़ले चश्म-ए-बयाबान में आ जाते हैं

बढ़ के अब दस्तक-ए-आवाज़ लगाओ 'आमिर'
दर दरीचे हद-ए-इमकान में आ जाते हैं