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शब ख़ुमार‌‌‌‌-ए-हुस्न-ए-साक़ी हैरत-ए-मयख़ाना था | शाही शायरी
shab KHumar-e-husn-e-saqi hairat-e-mai-KHana tha

ग़ज़ल

शब ख़ुमार‌‌‌‌-ए-हुस्न-ए-साक़ी हैरत-ए-मयख़ाना था

एहसान दानिश

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शब ख़ुमार‌‌‌‌-ए-हुस्न-ए-साक़ी हैरत-ए-मयख़ाना था
आप ही मय आप ही ख़ुम आप ही पैमाना था

का'बा-ओ-दैर कलीसा में अबस ढूँडा किए
दिल का हर गोशा मक़ाम-ए-जल्वा-ए-जानाना था

रंग लाया है बरा-ए-दीदा-ए-अंजाम जो
शम्अ' हर हर ज़र्रा-ए-ख़ाक-ए-पर-ए-परवाना था

ख़ामी-ए-ज़ौक़-ए-नज़र थी वर्ना ऐ नाकाम-ए-इश्क़
ज़र्रे ज़र्रे से नुमायाँ जल्वा-ए-जानाना था

फिर वही सौत-ए-तरब-अफ़ज़ा बने फ़िरदौस-ए-गोश
जिस से इक आलम शहीद-ए-नग़्मा-ए-मस्ताना था

दीद के क़ाबिल तमाशा था ये हंगाम-ए-सहर
शम्अ' का हर साँस महव-ए-मातम-ए-परवाना था

फ़ित्ना-ए-मज़हब भी ख़ुद-बीनी का इक अंदाज़ है
वर्ना किस को इम्तियाज़-ए-मस्जिद-ओ-बुत-ख़ाना था